Bhor Uske Hisse Ki by Ranvijay
भोर उसके हिस्से की
द्वारा : रण
विजय
प्रकाशक : साहित्य विमर्श प्रकाशन
तीन सुशिक्षित, युवा
उच्च अधिकारी महिलाओं की एक भोग्य नारी से हटकर स्वयं
को एवं स्वयं की पहचान ढूंढने की तलाश की यात्रा है “भोर
उसके हिस्से की” . उनके मनोभावों का उनकी दैनंदिनी में विभिन्न उतार चढ़ावों का बढ़े
बढे तनावों का छोटी छोटी खुशियों का चित्रण है,
और चित्रण है उनकी स्वयम के अस्तित्त्व को ढूंढने की एक अंतहीन सी
यात्रा की, उनके मैन में चलते झंझावातों
से, रूढ़ियों के घेरों से , दकियानूसी
समाज के दिशानिर्देशों से दूर निकल जाने के प्रयास के पहले कदम की। यह इस तथ्य को
सामने रखने का और सोचने पर विवश करने का सशक्त एवं सफल प्रयास है की नारी का एक स्वतंत्र अस्तित्व है और वह उस
अस्तित्व को जीना चाहती है जहां सिर्फ वह है न किसी की
पत्नी , बेटी या माँ बस वह है सिर्फ
स्वयम के साथ स्वयम के लिये। साथ ही सामाजिक मुद्दे भी हैं, जैसे
बेटे की चाहत, बेटियों से दोयम दर्जे का
व्यवहार, बेटियों की उपेक्षा,जो बेटी
के दिल पर परिवार के प्रति एक नफरत का दाग ता-उम्र के लिए छोड़ जाती है। शासकीय
कार्य शैली पर भी तंज कसा गया
है। वही सिस्टम के साथ चलने की मजबूरी और कुछ न कर पाने की कसक भी नजर आती है।
विषय गंभीर है किन्तु
अत्यंत रोचक एवं सरल वाक्यांशों से कहीं भी बोझिलता हावी नहीं हो सकी है। लेखन में विविधता रखना लेखक का शौक है संभवत:
विशिष्टता भी। स्वयं उच्च पदासीन होने के उत्तरदायित्वों के संग संग विषय के साथ भी पूर्ण न्याय
किया है। समसामयिक विषय है एवं विशेष तौर पर स्त्री पात्रों की मनोदशा कामकाजी महिलाओं को अवश्य ही इसकी विषय वस्तु से जोड़ेगी क्यूंकी यह किसी एक महिला की कहानी
नहीं है। स्वयं पुरुष होते हुए नारी मन को इतना अच्छे से समझना और फिर उन भावों को शब्द देना निश्चय ही प्रशंसनीय है, लेखक भावों को अभिव्यक्ति देने में पूर्ण सफल
रहे है और बहुत सुंदर तरीके से सभी प्रकार के भावों को बहुत स्पष्टता के साथ रखा
है। हमारे समाज में एक नारी या लड़की जिसकी न कोई ख्वाहिश होती है न ही पसंद,उसे शायद यह अधिकार ही नहीं दिया गया है फिर भी अगर भूलवाश कोई कुछ ख्वाहिश पाल ही ले तो उसका गला घोंटने का शुभ कार्य परिवार द्वारा संपादित कर दिया जाता है।
कथानक में, बगावत
करके अपनी ख्वाहिशें सच करने की संघर्ष यात्रा भी दर्शाई है, आम तौर पर पुरुष का अहं नारी को अपने से आगे नहीं देख पाता, और स्त्री यदि किसी भी प्रकार से
श्रेष्ट हो तो पुरुष के अंदर का मर्द तो है ही इस से निपटने को
तैयार क्यूंकी उसके लिए तो स्त्री सिर्फ भोग्या है। उसे भोग कर, उसका स्त्रीत्व कुचलकर वह स्वयं को
विजेता मान बैठता है,उसी प्रकार
यह प्रश्न भी कथानक के जरिए पाठकों के विचारण हेतु
छोड़ दिया गया है की दाम्पत्य जीवन बनाए रखने का एकमात्र
उत्तरदायित्व स्त्री का ही है क्या। पुरुष विवाहित होकर भी आजाद भँवरा
है किन्तु स्त्री पर तमाम बंदिशें लागू हो जाती है घर परिवार बच्चों
की एवं अन्य सामाजिक औपचारिकताएं रीति
रिवाज निभाने की भी .
आज की नारी, सदियों
से पुरुष प्रधान समाज की नीतियों से इतनी ज्यादा शोषित
एवं उपेक्षित हुई है की इतने बड़े प्रशासनिक पदों
पर आसीन युवतियाँ भी ऊहापोह की स्थिति में है की पति को
सूचित किए बिना क्या वे विदेश जा सकती है। न बताए ऐसा
विचार आता जरूर है पर उस के आगे बढ़ नहीं पाता। विदेश में भ्रमण के दौरान विभिन्न
स्थलों पर उनके व्यवहार के द्वारा उनके आपसी बोलचाल के द्वारा उनकी उन्मुक्तता की
खुशी, उनके बंधनों से बाहर जिंदगी जीने की उमंग वह ज़िंदगी जो
उनकी खुद की ज़िंदगी है जी लेने का एहसास दिखलाता है।
विदेश भ्रमण तो सांकेतिक है,उन्मुक्तता की चाहत बंधनों का
टूटना अपने आप की मानसिक दासता पर विजय प्राप्त होने की खुशी दर्शाने हेतु लेखक ने
बखूबी इस का इस्तेमाल किया है, लेखक
अपने मन्तव्य में पूरी तरह से सफल है एवं पाठक को उस ओर न केवल ले गए है जहां वे
ले जाना चाहते है अपितु उन्हें जिस सोच के साथ वो छोड़ना चाहते है पाठक अपने को उसी
अवस्था में पाता है। मानसिक रूप से वह पूरी तरह जुड़
जाता है कथावस्तु से। अतः निश्चित
ही वह उन मुद्दों पर मनन करने को भी विवश होगा जो लेखक ने उनके लिए रख छोड़े हैं।
यह सामाजिक स्तर पर हम सभी के लिए शर्मनाक भी है
एवं शोचनीय भी, चिंताजनक
तो खैर सदैव से ही है कि यदि हम स्वयम को विकसित कहते है तब भी क्यू महिला
अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है, हर पल उसका
संघर्ष जारी है चाहे कार्य स्थल पर पुरुष सहकर्मियों की चुभती निगाहें हों या घर
से निकलते हुए पति की उस पर शंका भारी नज़र। उसका जीवन इन्ही पाटों के बीच पीस जाता है उसका मैं तो उसे कभी मिलता ही नही। पुरुष और नारी का रिश्ता कभी पुरुष की नारी शरीर की चाहत से हटकर उसे एक
साथी का दर्जा देंने का हो पायेगा क्या। प्रेम सिर्फ
स्त्री करती है पुरुष तो सिर्फ दैहिक आकर्षण से बंधा
है। पत्नी का प्रेम दिल से शुरू होकर देह पाता है जबकि
पुरुष का प्रेम देह से ही शुरू होता है और बाज़ दफ़ा
वहीं दम तोड़ देता है या समाप्त कर दिया जाता है
क्योंकि उसका स्वार्थ था ही उतना। जहां स्वार्थ है वहाँ प्रेम कहाँ वह तो व्यापार हुआ। प्रेम तो निश्छल निष्काम है यह शायद कभी
समाज समझे।सम्पूर्ण कथानक के दौरान इन सभी बिंदुओं पर भी लेखक की पैनी दृष्टि बनी
रही है।
हर कदम पर यह संदेश
बहुत स्पष्ट है कि नारी को वर्जनाओं, खोखली मान्यताओं या रस्मों के नाम पर बांध कर रखा
गया है उन्हें उनके हिस्से की ज़िंदगी जीने का हक़ तो मिलना ही चाहिए। अपनी ज़िंदगी
का एक छोटा सा हिस्सा ही सही जब वे अपने ढंग से जी कर आती है तब उनकी मानो नई
जिंदगी उन्हें मिल गयी। जो वर्जनाएं तोड़ी या सीमाएं जो लांघी गयी उन को लेकर कोई
अपराध बोध न हो अतः उनकी भी पात्रों के ही
द्वारा इतनी सुंदर विवेचना करवा दी है
कि किसी शक शुबहे की गुंजाइश ही नही रहे।। बीच बीच में
विज्ञान संबंधित हल्की फुल्की जानकारी देते जाना ज्ञानवर्धक होने के साथ स्थान
विशेष हेतु उपयुक्त भी है वही विदेश यात्रा में स्थानों इत्यादि का खूबसूरत वर्णन
आंखों के समक्ष साक्षात दृश्य उपस्थित कर देते है।
सिर्फ एक बार पढ़ कर लग
रहा है जैसे अभी इसमें कुछ और भी अच्छा मिलेगा इसलिए मैं तो इसे दोबारा पढ़ रहा हूँ
आप का मन कितनी बार पढ़ने को करा बताईएगा ज़रूर।
कथानक को जैसा मैंने
समझा समीक्षा रूप में प्रस्तुत है, शेष, आप स्वयं पढ़ें और
निर्णय लें। पर पढ़ें जरूर। पुस्तक ऑन लाइन उपलब्ध है।

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